पोस्ट पढ़े और तय करें इसमें सरकार तो पूरी तरह जिम्मेदारी है ही लेकिन पढ़े लिखे और मौका परस्त लोग भी उतने ही जिम्मेदार है 

केंद्र सरकार के कथनी और करनी में बहुत अंतर है- #मीडिया_माफिया और झूठे सत्ता सहयोगियों से झूठ फैला रहे हैं जबकि गरीब प्रवासी मजदूरों को सही से खाना मुहैया नहीं करा पा रही है, आज दो महीने हो गए लेकिन मजदूरों की दशा अब दुर्दशा में बदल चुकी है जो खुले आसमान के नीचे पैदल यात्रा करते और बेबस ,पैरों में छाले लिये लोग दिख रहे हैं. केंद्र सरकार और राज्य सरकारें सिर्फ अपनी कागजी बाजीगरी से मूर्ख बना कर अपना #आर्थिक लूट अभियान चला रही है।

 एक तरफ देखा जा सकता है विदेशों से लोगो हवाई जहाज से लाया जा सकता है लेकिन कमजोर गरीब पुरुष महिलाओं और बच्चों को उनके गांव भेजने में पूरी तरह असमर्थ है, सैकड़ो किलोमीटर मासूम बच्चे, गर्भवती महिलाएं चले जा रहे हैं, रास्तों में असह्य पीड़ा झेल रहे ,सड़क हादसों के शिकार हो रहे हैं ,भूंख प्यास से मर रहे हैं, यह सब मोदी सरकार की विफलताओं को प्रदर्शित कर रही है, क्या ऐसे आदमखोर सत्ताखोर लोकतंत्र में पुनः आना चाहिए विचार करें!

 बड़ी बड़ी बातें नए झूठे पैकेजिंग में मीडिया द्वारा सुबह शाम परोसे जा रहे हैं, हिन्दू मुस्लिम कर गरीबों की पीड़ा को छुपाया जा रहा है , आज हर जगह टीवी ,सोशल मीडिया, टिकटोक पर गरीबों की बेबसी और पीड़ादायक स्तिथि देखी जा सकती है।

     एक तरफ मक्कार लोग अर्थ विशेषगज्ञ बन सरकार के झूठे मनमोहक 20 लाख करोड़ के अर्थ गुलामी के पैकेज के फायदे गिना रहे हैं लेकिन गरीबो भूंखो को खाना और उनके घर जाने की कोई आर्थिक व्यवस्था नही की है। क्या रेलवे और बस परिवहन विभाग को केंद्र 2000 करोड़ देकर फ्री प्रवासियों को घर नही भेजा जा सकता है लेकिन सरकार मजदूरों के ऊपर अपनी राजनीतिक विसात बिछा रही है जिससे राजनीतिक गुलाम बना कर पुनः इन्हें तड़पने मरने के लिए तैयार कर सके। क्या देश की इस हालत और गरीबो को भूँखा मारने और शहरों में बंधक बनाने के सवाल नही खड़े होने चाहिये सरकार के सामने , फिर चुप क्यों बैठे हो सरकार से जबाब माँगें। 

#LockDown के 5 महीना बीत जाने के बाद भी देश-व्यापी स्तर पर मेहनतकश मजदूरों की दुर्दशा का सिलसिला थमा नहीं है. हर दिन भूख, जिल्लत और अपने ही देश में बेगानेपन का दंश झेलते मजदूरों के हुजूम-दर-हुजूम चारों तरफ दिखाई दे रहे, केंद्र सरकार का लॉकडाउन लगाने का तरीका गलत रहा. 4 घंटे के नोटिस पर देश में लॉकडाउन लगा दिया गया. सरकार को पहले ये कहना चाहिए था कि अगले चार-पांच दिनों में देश में लॉकडाउन होगा. सभी लोग अपनी-अपनी जगह पर ही रहें. फिर भी जो लोग जाना चाहते हैं, उनके लिए घर जाने की व्यवस्था कराई जा रही है. उन्हें घर पहुंचाने के बाद लॉकडाउन लगाना चाहिए था.

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस संजय किशन कॉल ने अपने आदेश में कहा कि मीडिया रिपोर्ट्स में यह लगातार सामने आ रहा है कि प्रवासी मजदूर अभी भी साइकिल से, यहाँ तक की पैदल अपने घरों की ओर लौटने को मजबूर हैं। ये मजदूर अभी भी हाईवे और राज्य की सीमाओं में फँसे हैं और इनके लिए सरकारी इंतजाम अपर्याप्त हैं। दो पन्नों के इस आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण हैं कि समाज के इस वर्ग को लॉकडाउन के दौरान लम्बी दूरियां पैदल तय करनी पड़ रही है। ये मजदूर जहाँ फँसे हैं वहां से प्रशासन और सरकार के खिलाफ खाने-पीने के इंतजामों को लेकर शिकायत कर रहे हैं।

पढ़े और तय करें क्या इसमें सरकार पूरी तरह जिम्मेदारी है ?

  • – Somvir Singh

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